Saturday, May 7, 2011

पर्यावरण को संजोकर रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।निषंक’

देहरादून 07 मई, 2011 शनिवार को देहरादून के मंथन सभागार में ‘‘स्टेट एक्षन प्लान आॅन क्लाइमेंट चेंज (ै।च्ब्ब्) उत्तराखण्ड’’ विषय पर आयोजित कार्यषाला को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री डाॅ. रमेष पोखरियाल ‘निषंक’ ने कहा कि पर्यावरण को संजोकर रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकता है कि नदियों का अविरल प्रवाह बना रहे। सरस्वती नदी विलुप्त हो चुकी है और अन्य नदियों का हस्र भी यही न हो, इसके लिए समेकित प्रयासों की आवष्यकता है। जल स्रोतों को बचाना और भी आवष्यक है, ताकि जल संकट की गंभीर समस्या का सामना किया जा सके। प्राकृतिक वातावरण के असन्तुलन से पर्यावरण की समस्या उत्पन्न हो रही है। प्रकृति के असंन्तुलन को दूर करना है। विष्व को भी हम इस ओर प्रेरित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण बचाने व प्रकृति के मौलिक स्वरूप को बचाये रखने के लिये ठोस योजना बनाये जाने तथा कारगर नीति बनाने की आवष्यकता है। इस ओर वैज्ञानिकों को सोचना होगा। मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड में प्रतिवर्ष करोड़ों की संख्या में पर्यटक, तीर्थयात्री और श्रद्धालु आते है, ऐसे में उत्तराखण्ड के शुद्ध पर्यावरण को बचाये रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। फिर भी राज्य सरकार अपने संसाधनों से इस दिषा में कार्य कर ही है। राज्य में आने वाले पर्यटकों को जागरूक किया जा रहा कि वे प्राकृतिक स्थलों पर कूड़ा न फैलायें। तीर्थ स्थलों पर प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके साथ ही हमने नक्षत्र वन वाटिका जैसी अभिनव योजना शुरू की है। जिसका मुख्य उद्देष्य प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण को बचाना है। इस योजना में ग्रह अनुसार प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पौधारोपण करने से प्रकृति की बड़ी सेवा होगी।
मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचने के लिए मिलकर कार्य करने की आवष्यकता है। हमारी प्राकृतिक विषमता उच्च, मध्य, तराई में अलग-अलग स्थिति में इसके लिये अलग-अलग कार्ययोजना बनाने की आवष्यकता है। पृथ्वी में असमानता बढ़ रही है। ग्लेषियर संकट में है, जो निरंतर पीछे जा रहे हैं। अतिवृष्टि व सुनामी से तबाही हो रही है। इस पर विचार करने की जरूरत है। प्रकृति व प्रवृत्ति का समन्वय न होने से प्राकृतिक विषमता का संकट बढ़ा है। प्रकृति में विकृति पैदा हुई है। प्रकृति की विकृति को रोकने के लिये कार्य योजना बनाने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि इस कार्यषाला में आये विषेषज्ञों द्वारा उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हो रहे जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव आयेंगे। उन्होंने कहा कि विष्व प्रकृति निधि-भारत (ॅॅथ्.प्छक्प्।) द्वारा किये जा रहे कार्य सराहनीय है और इसमें राज्य सरकार पूरा सहयोग करेगी।
कार्यषाला में मुख्य सचिव सुभाष कुमार, प्रमुख वन संरक्षक डाॅ. आर.बी.एस.रावत, हेमवती नंदन गढ़वाल केन्द्रीय विष्वविद्यालय कुलपति प्रो. एस.के.सिंह, अपर प्रमुख वन संरक्षक जय राज, प्रो. आर.सी.शर्मा, ॅॅथ्.प्छक्प्। के क्षेत्रीय प्रमुख सुश्री अर्चना चटर्जी, डाॅ. सेजल वोराह आदि उपस्थित थे।

No comments:

Post a Comment